आवश्यकता से अधिक हानिकारक...पढे प्राचीन परन्तु विचारणीय कहानी

बहुत समय की बात है एक बहुत धनवान राजा था । उसका नाम मिडास था ।धनवान होने पर भी वह संन्तुष्ट नही था । उसे पैसे और सोने का बहुत अधिक सालच था । एक दिन उसके सपने मे एक परी आयी । वह जाग उठा । उसने देखा की वह परी उसके सामने खडी है। अपने बिस्तर से उठकर राजा परी के चरणों मे गिर गया।उसने परी की प्रशंसा करते हूए कहा कि " आप कितनी सुंदर हो, मैने सुना है कि परियॉ मनुष्य कि इच्छायें पुर्ण करती हैं।"  "परि मुस्कुराते हूए बोली, " हे राजन, ! कहिए , आपकी क्या इच्छा है ? हम आपकी इच्छा पुर्ण करेंगें ।" राजा को कुछ समय तक समझ मे नही आया कि वह क्या मांगे । थोडी देर बाद राजा ने कहा कि मै जिस चीज को भी छूऊँ वह सोना बन जायें। परी ने राजा की इच्छा पुर्ण कर दी। धीरे धीरे राजा एक पत्थर के पास गया । राजा ने अपना हाथ जब पत्थर को लगाया तो पत्थर सोना बन गया । राजा तो जैसे खुशी से नाचने लगा । राजा ने एक फूल को देखा , उसे छुआ तो वह भी सोना बन गया । राजा अपने बगीचे के सभी फूल-पौंधों को छूने लगा । वह जिसे भी छूता वह सोने में परिवर्तित हो जाता । राजा तो जैसे खुशी से पागल हुआ जा रहा था ।


      कुछ देर बाद जब उसे भूख लगी तब उसने फल और पानी मँगवायाऔर जब खाने के लिए हाथ लगाया तो

फल सोनें मे बदल गये । पानी के जग को छूते ही वह भी सोने का हो गया । राजा अब न कुछ खा सकता था और न पी सकता था । अपनी मुर्खता पर राजा को बहुत दुःख हूआ । राजा को दुःखी देखकर राजा की बेटी राजा के पास आयी तो राजा ने प्यार से अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा तो वह भी सोने की मुर्ती बन गयी । अब राजा और अधिक दुःखी हो गया । पश्चाताप के ऑसूओं मे राजा जब डूबा हुआ था तब वही परी उसके सामने पुनः प्रत्यक्ष हो गयी । उसने कहा - " हे राजन, मैंने तो सोचा कि आप बहुत खुश होंगे लेकिन आप तो बहुत दुःखी दिख रहे हैं । क्या आपको मिली शक्ति से आप खुश नही हैं ? क्या आपको कुछ और चाहिए।" तब राजा ने परी के पॉव पकडे और माफी मॉगतें हुए कहा, " कृपया आप यह शक्ति वापस ले लीजिए और मुझे मेरी बेटी तथा मेरा सामान्य जीवन वापस दे दीजिए। मेरे पास बहुत धन है और आज से मैं कभी लालच नही नहीं करूँगा । अपना धन गरिबों मे बाँटूँगा ।" यह सुनकर परी ने अपनी दी हुयी शक्ति वापस ले ली । राजा बहुत खुश हो गया और सदा के लिए उसने सोने के प्रति अपना लालच छोड दिया ।

                 *आध्यात्मिक भाव*

         लोभ सदा हानी पहुँचाता है । जितना है उतने में ही सन्तुष्ट रहना भी एक कला है । बाबा कहते हैं कि स्थुल धन कमाने मे ही सारा समय गँवाना नही हैं । उसके साथ-साथ अपने जीवन मे परोपकार और आध्यात्मिक जागृति आवश्यक है ।
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